कंजूस सेठ और फटा हुआ जूता

एक कस्बे में लालचंद सेठ नाम का एक बहुत अमीर व्यापारी रहता था। उसके पास दुकानों और गोदामों की कमी नहीं थी, मगर पहनने को वही पुराना जूता, जो आगे से फट चुका था। लोग हैरान होकर पूछते,“<br>सेठ जी, नया जूता क्यों नहीं ले लेते?”

सेठ हँसकर कहते,“<br>अरे, जब तक पैर दिख नहीं रहा, तब तक जूता ठीक है।”

एक दिन सेठ जी को पास के शहर में बड़े सौदे के लिए जाना था। उन्होंने वही फटा जूता पहन लिया। रास्ते में बारिश हो गई, सड़क पर कीचड़ फैल गया और जूते का फटा हिस्सा और खुल गया। चलते-चलते सेठ जी का पैर फिसला और वे कीचड़ में गिर पड़े।

कपड़े गंदे हो गए, पैर में चोट लग गई और शहर पहुँचते-पहुँचते देर हो गई। उधर व्यापारी उनका इंतज़ार करते-करते सौदा किसी और से तय कर चुके थे। सेठ जी को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

घर लौटकर सेठ बहुत दुखी हुए। उन्होंने सोचा,“<br>नया जूता खरीदने में जो थोड़े से पैसे लगते, वही आज मुझे लाखों के नुकसान से बचा लेते।”

अगले ही दिन उन्होंने नया जूता खरीदा और कसम खाई कि समझदारी में की गई बचत और बेवजह की कंजूसी में फर्क समझेंगे।

सीख:<br>छोटी बचत के चक्कर में बड़ा नुकसान उठाना ही सच्ची कंजूसी है।