कंजूस सेठ और घी की बूँद
एक समय की बात है। एक छोटे से भारतीय कस्बे में धनदास सेठ नाम का एक व्यापारी रहता था। सेठ जी बहुत अमीर थे, मगर उनकी कंजूसी पूरे इलाके में मशहूर थी। लोग मज़ाक में कहते थे—“धनदास सेठ का दिल नहीं, तिजोरी धड़कती है।”
सेठ जी के घर रोज़ पकवान बनते थे, लेकिन घी इतना कम डाला जाता कि रोटी भी शिकायत करने लगे। नौकर को एक चम्मच चीनी लेने की इजाज़त होती, तो दो दाने गिर जाएँ तो वे ज़मीन से उठाकर डिब्बे में रखवा देते।
एक दिन कस्बे में भयंकर ठंड पड़ने लगी। सेठ जी ने सोचा, “अगर थोड़ा सा घी खा लूँ तो शरीर में गर्मी आ जाएगी।” उन्होंने रसोई से घी का डिब्बा मंगवाया और चम्मच से बस एक बूँद घी निकाली। लेकिन दुर्भाग्य से वह बूँद चम्मच से फिसलकर ज़मीन पर गिर गई।
सेठ जी घबरा गए। बोले, “अरे! मेरी घी की बूँद!”<br>वे झुककर उसे उठाने लगे, मगर तब तक ज़मीन में समा चुकी थी। सेठ जी इतने परेशान हुए कि उसी बूँद को ढूँढने के लिए आधा घंटा ज़मीन कुरेदते रहे।
यह देखकर पास से गुजर रहा एक साधु मुस्कराया और बोला,“<br>सेठ जी, धन तो आपके पास बहुत है, लेकिन मन में संतोष नहीं। जो आदमी बूँद बचाने में ज़िंदगी गंवा दे, वह सागर पाकर भी गरीब ही रहता है।”
सेठ जी को साधु की बात तीर की तरह लगी। पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि उनकी कंजूसी ने उन्हें इंसान नहीं, गुलाम बना दिया है। उसी दिन उन्होंने फैसला किया कि अब जरूरतमंदों की मदद करेंगे और जीवन को खुलकर जिएँगे।
कहते हैं, उसके बाद धनदास सेठ अमीर भी रहे और सम्मानित भी।
सीख:<br>दौलत बचाना गलत नहीं, लेकिन कंजूसी अगर इंसानियत छीन ले—तो वह सबसे बड़ी गरीबी बन जाती है।
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