कंजूस सेठ और दीया
एक गाँव में हरिराम सेठ नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन खर्च करने के नाम पर उसका हाथ हमेशा काँपता रहता था। लोग कहते थे, “सेठ जी पैसे नहीं गिनते, पैसे उन्हें गिनते हैं।”
दीवाली का समय आया। पूरे गाँव में घर-घर दीये जल रहे थे। बच्चे पटाखे चला रहे थे, मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी। मगर हरिराम सेठ के घर सिर्फ एक दीया जला हुआ था—वह भी दरवाज़े के कोने में।
पत्नी ने कहा,“<br>सेठ जी, आज तो दीवाली है। दो-चार दीये और जला दीजिए, घर अच्छा लगेगा।”
सेठ जी बोले,“<br>अरे पगली! तेल महँगा है। एक दीया भी बहुत है, उजाला तो हो ही रहा है।”
रात गहराई। तेज़ हवा चली और वह एकमात्र दीया भी बुझ गया। पूरा घर अँधेरे में डूब गया। सेठ जी अँधेरे में चलते हुए ठोकर खा बैठे। सिर फूट गया, कपड़े खराब हो गए और डॉक्टर को बुलाना पड़ा।
सुबह गाँव वाले हाल पूछने आए। एक बुज़ुर्ग ने मुस्कराते हुए कहा,“<br>सेठ जी, अगर कल दो-चार दीये जला दिए होते, तो न अँधेरा होता, न चोट लगती।”
सेठ जी चुप हो गए। उन्हें समझ आ गया कि जहाँ थोड़े खर्च से बड़ा नुकसान टल सकता हो, वहाँ कंजूसी समझदारी नहीं, मूर्खता होती है।
उस दिन के बाद हरिराम सेठ ने सीखा कि पैसा सिर्फ जमा करने के लिए नहीं, सही समय पर खर्च करने के लिए भी होता है।
सीख:<br>ज़रूरत की जगह किया गया खर्च नुकसान नहीं, बल्कि समझदारी होता है।
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